Saturday, 14 July 2018

आदित्य हृदय स्तोत्र

आदित्य हृदय स्तोत्र संपूर्ण पाठ
आदित्य ह्रदय स्तोत्र का पाठ नियमित करने से अप्रत्याशित लाभ मिलता है। आदित्य हृदय स्तोत्र के पाठ से नौकरी में पदोन्नति, धन प्राप्ति, प्रसन्नता, आत्मविश्वास के साथ-साथ समस्त कार्यों में सफलता मिलती है। हर मनोकामना सिद्ध होती है। सरल शब्दों में कहें तो आदित्य ह्रदय स्तोत्र हर क्षेत्र में चमत्कारी सफलता देता है। पढ़ें संपूर्ण पाठ...
विनियोग
ॐ अस्य आदित्यह्रदय स्तोत्रस्य अगस्त्यऋषि: अनुष्टुप्छन्दः आदित्यह्रदयभूतो
भगवान् ब्रह्मा देवता निरस्ताशेषविघ्नतया ब्रह्माविद्यासिद्धौ सर्वत्र जयसिद्धौ च विनियोगः
पूर्व पिठिता
ततो युद्धपरिश्रान्तं समरे चिन्तया स्थितम्‌ ।
रावणं चाग्रतो दृष्ट्वा युद्धाय समुपस्थितम्‌ ॥1॥
दैवतैश्च समागम्य द्रष्टुमभ्यागतो रणम्‌ ।
उपगम्याब्रवीद् राममगस्त्यो भगवांस्तदा ॥2॥
राम राम महाबाहो श्रृणु गुह्मं सनातनम्‌ ।
येन सर्वानरीन्‌ वत्स समरे विजयिष्यसे ॥3॥
आदित्यहृदयं पुण्यं सर्वशत्रुविनाशनम्‌ ।
जयावहं जपं नित्यमक्षयं परमं शिवम्‌ ॥4॥
सर्वमंगलमागल्यं सर्वपापप्रणाशनम्‌ ।
चिन्ताशोकप्रशमनमायुर्वर्धनमुत्तमम्‌ ॥5॥
मूल -स्तोत्र
रश्मिमन्तं समुद्यन्तं देवासुरनमस्कृतम्‌ ।
पुजयस्व विवस्वन्तं भास्करं भुवनेश्वरम्‌ ॥6॥
सर्वदेवात्मको ह्येष तेजस्वी रश्मिभावन: ।
एष देवासुरगणांल्लोकान्‌ पाति गभस्तिभि: ॥7॥
एष ब्रह्मा च विष्णुश्च शिव: स्कन्द: प्रजापति: ।
महेन्द्रो धनद: कालो यम: सोमो ह्यापां पतिः ॥8॥
पितरो वसव: साध्या अश्विनौ मरुतो मनु: ।
वायुर्वहिन: प्रजा प्राण ऋतुकर्ता प्रभाकर: ॥9॥
आदित्य: सविता सूर्य: खग: पूषा गभस्तिमान्‌ ।
सुवर्णसदृशो भानुर्हिरण्यरेता दिवाकर: ॥10॥
हरिदश्व: सहस्त्रार्चि: सप्तसप्तिर्मरीचिमान्‌ ।
तिमिरोन्मथन: शम्भुस्त्वष्टा मार्तण्डकोंऽशुमान्‌ ॥11॥
हिरण्यगर्भ: शिशिरस्तपनोऽहस्करो रवि: ।
अग्निगर्भोऽदिते: पुत्रः शंखः शिशिरनाशन: ॥12॥
व्योमनाथस्तमोभेदी ऋग्यजु:सामपारग: ।
घनवृष्टिरपां मित्रो विन्ध्यवीथीप्लवंगमः ॥13॥
आतपी मण्डली मृत्यु: पिगंल: सर्वतापन:।
कविर्विश्वो महातेजा: रक्त:सर्वभवोद् भव: ॥14॥
नक्षत्रग्रहताराणामधिपो विश्वभावन: ।
तेजसामपि तेजस्वी द्वादशात्मन्‌ नमोऽस्तु ते ॥15॥
नम: पूर्वाय गिरये पश्चिमायाद्रये नम: ।
ज्योतिर्गणानां पतये दिनाधिपतये नम: ॥16॥
जयाय जयभद्राय हर्यश्वाय नमो नम: ।
नमो नम: सहस्त्रांशो आदित्याय नमो नम: ॥17॥
नम उग्राय वीराय सारंगाय नमो नम: ।
नम: पद्मप्रबोधाय प्रचण्डाय नमोऽस्तु ते ॥18॥
ब्रह्मेशानाच्युतेशाय सुरायादित्यवर्चसे ।
भास्वते सर्वभक्षाय रौद्राय वपुषे नम: ॥19॥
तमोघ्नाय हिमघ्नाय शत्रुघ्नायामितात्मने ।
कृतघ्नघ्नाय देवाय ज्योतिषां पतये नम: ॥20॥
तप्तचामीकराभाय हरये विश्वकर्मणे ।
नमस्तमोऽभिनिघ्नाय रुचये लोकसाक्षिणे ॥21॥
नाशयत्येष वै भूतं तमेष सृजति प्रभु: ।
पायत्येष तपत्येष वर्षत्येष गभस्तिभि: ॥22॥
एष सुप्तेषु जागर्ति भूतेषु परिनिष्ठित: ।
एष चैवाग्निहोत्रं च फलं चैवाग्निहोत्रिणाम्‌ ॥23॥
देवाश्च क्रतवश्चैव क्रतुनां फलमेव च ।
यानि कृत्यानि लोकेषु सर्वेषु परमं प्रभु: ॥24॥
एनमापत्सु कृच्छ्रेषु कान्तारेषु भयेषु च ।
कीर्तयन्‌ पुरुष: कश्चिन्नावसीदति राघव ॥25॥
पूजयस्वैनमेकाग्रो देवदेवं जगप्ततिम्‌ ।
एतत्त्रिगुणितं जप्त्वा युद्धेषु विजयिष्यसि ॥26॥
अस्मिन्‌ क्षणे महाबाहो रावणं त्वं जहिष्यसि ।
एवमुक्ता ततोऽगस्त्यो जगाम स यथागतम्‌ ॥27॥
एतच्छ्रुत्वा महातेजा नष्टशोकोऽभवत्‌ तदा ॥
धारयामास सुप्रीतो राघव प्रयतात्मवान्‌ ॥28॥
आदित्यं प्रेक्ष्य जप्त्वेदं परं हर्षमवाप्तवान्‌ ।
त्रिराचम्य शूचिर्भूत्वा धनुरादाय वीर्यवान्‌ ॥29॥
रावणं प्रेक्ष्य हृष्टात्मा जयार्थं समुपागतम्‌ ।
सर्वयत्नेन महता वृतस्तस्य वधेऽभवत्‌ ॥30॥
अथ रविरवदन्निरीक्ष्य रामं मुदितमना: परमं प्रहृष्यमाण: ।
निशिचरपतिसंक्षयं विदित्वा सुरगणमध्यगतो वचस्त्वरेति ॥31॥
।।सम्पूर्ण ।।
हिंदी अनुवाद
1,2 उधर श्रीरामचन्द्रजी युद्ध से थककर चिंता करते हुए रणभूमि में खड़े हुए थे । इतने में रावण भी युद्ध के लिए उनके सामने उपस्थित हो गया । यह देख भगवान् अगस्त्य मुनि, जो देवताओं के साथ युद्ध देखने के लिए आये थे, श्रीराम के पास जाकर बोले ।
3 सबके ह्रदय में रमन करने वाले महाबाहो राम ! यह सनातन गोपनीय स्तोत्र सुनो ! वत्स ! इसके जप से तुम युद्ध में अपने समस्त शत्रुओं पर विजय पा जाओगे ।
4,5 इस गोपनीय स्तोत्र का नाम है ‘आदित्यहृदय’ । यह परम पवित्र और संपूर्ण शत्रुओं का नाश करने वाला है । इसके जप से सदा विजय कि प्राप्ति होती है । यह नित्य अक्षय और परम कल्याणमय स्तोत्र है । सम्पूर्ण मंगलों का भी मंगल है । इससे सब पापों का नाश हो जाता है । यह चिंता और शोक को मिटाने तथा आयु का बढ़ाने वाला उत्तम साधन है ।
6 भगवान् सूर्य अपनी अनंत किरणों से सुशोभित हैं । ये नित्य उदय होने वाले, देवता और असुरों से नमस्कृत, विवस्वान नाम से प्रसिद्द, प्रभा का विस्तार करने वाले और संसार के स्वामी हैं । तुम इनका रश्मिमंते नमः, समुद्यन्ते नमः, देवासुरनमस्कृताये नमः, विवस्वते नमः, भास्कराय नमः, भुवनेश्वराये नमः इन मन्त्रों के द्वारा पूजन करो।
7 संपूर्ण देवता इन्ही के स्वरुप हैं । ये तेज़ की राशि तथा अपनी किरणों से जगत को सत्ता एवं स्फूर्ति प्रदान करने वाले हैं । ये अपनी रश्मियों का प्रसार करके देवता और असुरों सहित समस्त लोकों का पालन करने वाले हैं ।
8,9 ये ही ब्रह्मा, विष्णु शिव, स्कन्द, प्रजापति, इंद्र, कुबेर, काल, यम, चन्द्रमा, वरुण, पितर , वसु, साध्य, अश्विनीकुमार, मरुदगण, मनु, वायु, अग्नि, प्रजा, प्राण, ऋतुओं को प्रकट करने वाले तथा प्रकाश के पुंज हैं ।
10,11,12,13,14,15 इनके नाम हैं आदित्य(अदितिपुत्र), सविता(जगत को उत्पन्न करने वाले), सूर्य(सर्वव्यापक), खग, पूषा(पोषण करने वाले), गभस्तिमान (प्रकाशमान), सुवर्णसदृश्य, भानु(प्रकाशक), हिरण्यरेता(ब्रह्मांड कि उत्पत्ति के बीज), दिवाकर(रात्रि का अन्धकार दूर करके दिन का प्रकाश फैलाने वाले), हरिदश्व, सहस्रार्चि(हज़ारों किरणों से सुशोभित), सप्तसप्ति(सात घोड़ों वाले), मरीचिमान(किरणों से सुशोभित), तिमिरोमंथन(अन्धकार का नाश करने वाले), शम्भू, त्वष्टा, मार्तण्डक(ब्रह्माण्ड को जीवन प्रदान करने वाले), अंशुमान, हिरण्यगर्भ(ब्रह्मा), शिशिर(स्वभाव से ही सुख प्रदान करने वाले), तपन(गर्मी पैदा करने वाले), अहस्कर, रवि, अग्निगर्भ(अग्नि को गर्भ में धारण करने वाले), अदितिपुत्र, शंख, शिशिरनाशन(शीत का नाश करने वाले), व्योमनाथ(आकाश के स्वामी), तमभेदी, ऋग, यजु और सामवेद के पारगामी, धनवृष्टि, अपाम मित्र (जल को उत्पन्न करने वाले), विंध्यवीथिप्लवंगम (आकाश में तीव्र वेग से चलने वाले), आतपी, मंडली, मृत्यु, पिंगल(भूरे रंग वाले), सर्वतापन(सबको ताप देने वाले), कवि, विश्व, महातेजस्वी, रक्त, सर्वभवोद्भव (सबकी उत्पत्ति के कारण), नक्षत्र, ग्रह और तारों के स्वामी, विश्वभावन(जगत कि रक्षा करने वाले), तेजस्वियों में भी अति तेजस्वी और द्वादशात्मा हैं। इन सभी नामो से प्रसिद्द सूर्यदेव ! आपको नमस्कार है
16 पूर्वगिरी उदयाचल तथा पश्चिमगिरी अस्ताचल के रूप में आपको नमस्कार है । ज्योतिर्गणों (ग्रहों और तारों) के स्वामी तथा दिन के अधिपति आपको प्रणाम है ।
17 आप जयस्वरूप तथा विजय और कल्याण के दाता हैं । आपके रथ में हरे रंग के घोड़े जुते रहते हैं । आपको बारबार नमस्कार है । सहस्रों किरणों से सुशोभित भगवान् सूर्य ! आपको बारम्बार प्रणाम है । आप अदिति के पुत्र होने के कारण आदित्य नाम से भी प्रसिद्द हैं, आपको नमस्कार है ।
18 उग्र, वीर, और सारंग सूर्यदेव को नमस्कार है । कमलों को विकसित करने वाले प्रचंड तेजधारी मार्तण्ड को प्रणाम है ।
19 आप ब्रह्मा, शिव और विष्णु के भी स्वामी है । सूर आपकी संज्ञा है, यह सूर्यमंडल आपका ही तेज है, आप प्रकाश से परिपूर्ण हैं, सबको स्वाहा कर देने वाली अग्नि आपका ही स्वरुप है, आप रौद्ररूप धारण करने वाले हैं, आपको नमस्कार है ।
20 आप अज्ञान और अन्धकार के नाशक, जड़ता एवं शीत के निवारक तथा शत्रु का नाश करने वाले हैं । आपका स्वरुप अप्रमेय है । आप कृतघ्नों का नाश करने वाले, संपूर्ण ज्योतियों के स्वामी और देवस्वरूप हैं, आपको नमस्कार है ।
21 आपकी प्रभा तपाये हुए सुवर्ण के समान है, आप हरी और विश्वकर्मा हैं, तम के नाशक, प्रकाशस्वरूप और जगत के साक्षी हैं, आपको नमस्कार है
22 रघुनन्दन ! ये भगवान् सूर्य ही संपूर्ण भूतों का संहार, सृष्टि और पालन करते हैं । ये अपनी किरणों से गर्मी पहुंचाते और वर्षा करते हैं ।
23 ये सब भूतों में अन्तर्यामी रूप से स्थित होकर उनके सो जाने पर भी जागते रहते हैं । ये ही अग्निहोत्र तथा अग्निहोत्री पुरुषों को मिलने वाले फल हैं ।
24 देवता, यज्ञ और यज्ञों के फल भी ये ही हैं । संपूर्ण लोकों में जितनी क्रियाएँ होती हैं उन सबका फल देने में ये ही पूर्ण समर्थ हैं ।
25 राघव ! विपत्ति में, कष्ट में, दुर्गम मार्ग में तथा और किसी भय के अवसर पर जो कोई पुरुष इन सूर्यदेव का कीर्तन करता है, उसे दुःख नहीं भोगना पड़ता ।
26 इसलिए तुम एकाग्रचित होकर इन देवाधिदेव जगदीश्वर कि पूजा करो । इस आदित्यहृदय का तीन बार जप करने से तुम युद्ध में विजय पाओगे ।
27 महाबाहो ! तुम इसी क्षण रावण का वध कर सकोगे । यह कहकर अगस्त्यजी जैसे आये थे वैसे ही चले गए ।
28,29,30 उनका उपदेश सुनकर महातेजस्वी श्रीरामचन्द्रजी का शोक दूर हो गया । उन्होंने प्रसन्न होकर शुद्धचित्त से आदित्यहृदय को धारण किया और तीन बार आचमन करके शुद्ध हो भगवान् सूर्य की और देखते हुए इसका तीन बार जप किया । इससे उन्हें बड़ा हर्ष हुआ । फिर परम पराक्रमी रघुनाथ जी ने धनुष उठाकर रावण की और देखा और उत्साहपूर्वक विजय पाने के लिए वे आगे बढे । उन्होंने पूरा प्रयत्न करके रावण के वध का निश्चय किया ।
31 उस समय देवताओं के मध्य में खड़े हुए भगवान् सूर्य ने प्रसन्न होकर श्रीरामचन्द्रजी की और देखा और निशाचरराज रावण के विनाश का समय निकट जानकर हर्षपूर्वक कहा – ‘रघुनन्दन ! अब जल्दी करो’ ।
इस प्रकार भगवान् सूर्य कि प्रशंसा में कहा गया और वाल्मीकि रामायण के युद्ध काण्ड में वर्णित यह आदित्य हृदयम मंत्र संपन्न होता है ।

Friday, 13 July 2018

शनिदेव उपासना

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*"आज शनिवार शनिदेवतेचा वार"*
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धर्म ग्रंथांमध्ये सांगितल्यानुसार, शनिदेव यांची आराधना करून जगातील सर्व प्रकारचे सूख मिळवले जाऊ शकते.
शनि महाराज चांगल्या कर्माचे फळ देऊन भक्तांवर कृपा करतात. तर श्री शनीदेवतेचीआपल्यावर कृपा राहिल्यास बल, बुद्धि, ज्ञान आणि यशाच्या स्वरुपा आपल्याला मिळत असते.
शनिवार हे शनिदेवतेची आराधना करण्यासाठी चांगले दिवस मानले गेले आहेत. या दिवशी शनिदेवाची आराधना केल्यास आपल्यावर ही कृपा दृष्टी राहते." -
*शनि स्मरण मंत्र*
*नीलाञ्जनं समाभासं रविपुत्रं विनायकम्।*
*छायामार्तण्ड सम्भूतं तं नमामि शनैश्चरम्।।*
*शनि स्मरण मंत्रानंतर सुख संमृद्धीसाठी या मंत्रांचेही करा पठन-*
*१.ॐ दीनार्तिहरणाय नम:।*
*2. ॐ दैन्यनाशकराय नम:।*
*3. ॐ भानुपुत्राय नम:।*
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*!! शनिवार आवश्यक उपासना !!*
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आकाशातील नवग्रह मनुष्याच्या जीवनाची दिशा आणि दशा बदलतात म्हणून त्या ग्रहाच्या स्वामीची अथवा देवतेची शांती केल्यास, त्याला आयुष्यभर स्वास्थ्य, सुख, ऐश्वर्य आणि शांती प्राप्त होते.
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*🙏🏻🌺 !! शनि देव !! 🌺🙏🏻*

शनि हा सूर्यपुत्र म्हणून ओळखला जातो. शनि ग्रह सूर्याला प्रदक्षिणा घालतो. जन्मकुंडलीमध्ये शनि जर शुभ स्थानावर असेल तर जातकाला यश, ऐश्वर्य, दीर्घ आयुष्य आणि चिंतन शक्ति देतो. परंतु तो जर अशुभ स्थानात असेल तर अनाचार वाढवतो. शनिची दशा ही अडीच वर्षे आणि साडेसात वर्षे असते.
सौरमंडळात शनिचे स्थान पश्‍चिमेला असते.
शनि ग्रहाच्या प्रसन्नतेसाठी भैरव देवाची साधना उपयुक्त असते. शनिवारी उपवास करणार्‍यांनी दुपारनंतर भोजन करावे. भोजनात मिठाचा वापर करू नये.
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*!! उपासना मंत्र !!*

*ॐ शनैश्‍चराय नमः ॥*

*नीलाञ्जनसमाभासं रविपुत्रं यमाग्रजम् ।*
*छायामार्तण्डसम्भूतं तं नमामि शनैश्चरम् ।।*

I pray to Saturn, the slow moving, born of Shade and Sun, the elder brother of Yama,
the offspring of Sun, he who has the appearance of black collyrium .

*!! ध्यान मंत्र !!*

*ॐ सूर्यपुत्रो दीर्घदेही विशालाक्षः शिवप्रियः ।*
*मन्दाचारः प्रसन्नात्मा पीडा हरतु ते शनिः ॥*

*ॐ शं शनैश्‍चराय नमः ।*

*ॐ प्रां प्रीं प्रौं सः शनये नमः ।*

*शनिमंत्र संख्या -*

शनिदेवाच्या मंत्राची जपसंख्या २३००० आहे.
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*ॐ प्रां प्रीं प्रौं सः शनये नमः ।*

या मंत्राचा जप करावा आणि ते यंत्र लोखंडाच्या ताईतामध्ये किंवा काळ्या किंवा निळ्या वस्त्रात घालून धारण करावे.
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*शनि यंत्र*

या यंत्राची बेरीज कुठुनही केली तरी ३३ इतकीच येते.

हे यंत्र कोणत्याही महिन्यातील शुक्लपक्षात येणार्‍या पहिल्या शनिवारी सूर्यास्ताच्या एक तास आधी डाळिंबाची काडी किंवा काळ्या घोड्याच्या नालेपासून बनवलेली लेखणी अष्टगंधाच्या शाईत बुडवून भुर्जपत्रावर लिहावे. नंतर त्या यंत्राला धूप, दीप, काळी फुले वाहून
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*शनि दान*

*शनिदानाचे साहित्य -*

काळे तिळ, उडीद, तेल, काळे वस्त्र, लोखंड, काळी गाय, इंद्रनील, म्हैस इ. हे दान शनिवारी दक्षिणेसहित द्यावे.

🙏🏻🌺!! जय श्री राम !!🌺🙏🏻
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*संकलन :- सतीश अलोनी*
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Tuesday, 10 July 2018

विठू माझा लकुरवाळा

विठू माझा लेकुरवाळा
संगे गोपाळांचा मेळा  
विठू माझा लेकुरवाळा

निवृत्ती हा खांद्यावरी सोपानाचा हात धरी
पुढे चाले ज्ञानेश्वर मागे मुक्ताई सुंदर 
विठू माझा लेकुरवाळा

गोरा कुंभार मांडीवरी चोखा जीवा बरोबरी
बंका कडेवरी नामा करांगुळी धरी  
विठू माझा लेकुरवाळा

जनी म्हणे गोपाळा करी भक्तांचा सोहळा 
जनी म्हणे गोपाळा करी भक्तांचा सोहळा
विठू माझा लेकुरवाळा संगे गोपाळांचा मेळा 
विठू माझा लेकुरवाळा  

ये छह लोग हमेशा दुःखी रहते है

ये छह लोग हमेशा रहते हैं दुःखी

ईर्ष्यी घृणी नसंतुष्ट: क्रोधिनो नित्यशंकित:। परभाग्योपजीवी च षडेते नित्य दु:खिता: ।। (विदुर नीति श्लोक 22)

अर्थ - ईर्ष्या करने वाला, दूसरों से घृणा करने वाला, असंतुष्ट, क्रोधी, शंकाशील और पराश्रित ये छ: सदा दुःखी रहते है।

1 . जो दूसरों से जलता है - इंसान दूसरों को देखकर मन ही मन जलता रहता है, दूसरों के सुख और सफलता से दुःखी रहता है, ऐसा इंसान हमेशा ही दुःखी रहेगा, क्योंकि उसके सामने कोई ना कोई हमेशा ही सफल और सुखी होता रहेगा।

2 . दूसरों से नफरत करने वाला - जो इंसान दूसरों से नफरत करता है, वो हमेशा दुःखी रहेगा। उसके मन में हमेशा दूसरों को दुःख देने की बात चलती रहेगी, वो कभी खुद की खुशी के लिए काम नहीं कर पाएगा।

3. जो किसी बात से संतुष्ट ना हो - ऐसा आदमी जो कभी किसी भी चीज से संतुष्ट ना हो वो कभी खुश नहीं हो सकता, क्योंकि एक चीज पाने के बाद उसका मन संतुष्ट नहीं होगा, वो दूसरी चीज पाने के लिए प्रयासों में लग जाएगा। ऐसे में वो कभी किसी चीज का पूर्ण भोग नहीं कर पाएगा और हमेशा असंतुष्ट ही घूमता रहेगा।

4 . जिसे बात-बात पर गुस्सा आता हो - ऐसा इंसान जो हमेशा किसी ना किसी बात पर गुस्सा हो जाता हो। वो कभी सुखी नहीं रह सकता क्योंकि वो छोटी-छोटी बातों पर गुस्सा करके खुद को और दूसरों को दुःख पहुंचाता रहेगा।

5 . जो सब पर शक करता हो - ऐसा इंसान जिसे किसी पर भी भरोसा ना हो, जो सबको शक की नजर से देखे वो हमेशा ही दुःखी रहेगा क्योंकि वो किसी को भी अपना नहीं मान पाएगा। मन ही मन अकेलेपन का शिकार होता रहेगा।

6 . जो दूसरों पर आश्रित हो - ऐसा इंसान जो दूसरों पर आश्रित रहता हो, वो कभी सुखी नहीं हो सकता क्योंकि उसे उन्हीं लोगों के हिसाब से जीना होता है, जिन पर वो आश्रित होता है।

अन्नाचा अपमान करू नये

म्हणून अन्नावर कधी राग काढू नये...

ताटावरून उठविणे, उठणे, ताट फेकून देणे हे अत्यंत वाईट असते. माणसाच्या हातून कळत नकळत काही चुका होत असतात, पण त्यांचे परिणाम मात्र त्रासदायक असतात. घरोघरी आढळणारी एक मोठी चूक म्हणजे अन्नाचा अपमान. एखादा माणूस जेवायला बसलेला असतो तेवढ्यात घरात किरकिर सुरू होते. पती-पत्नी, मुले किंवा कुणीतरी पाहुण्यापैकी अचानक नको ते विषय काढतात. शब्दाला शब्द वाढत जातात. भांडणे सुरू होतात व कुणीतरी रागाने जेवणावरून उठून जातो. अन्न तसेच राहते. अन्नाचा म्हणजे अन्नपूर्णेचा अपमान होतो. नंतर घराण्याला उतरती कळा लागते.

घरचा कर्ता पुरुष अथवा स्त्री जेवायला बसले असताना त्यांना घरातील कोणत्याही अडचणी सांगू नका. त्यांना शांतपणाने चार घास खाऊ द्या. शत्रू जरी काही खात-पीत असेल, जेवत असेल तर त्याला सुखाने खाऊ द्या. काहीही बोलू नका. अन्नावरून रागाने उठणारी व्यक्ती अथवा त्याला तसे करण्यास भाग पाडणारा कुणीही असो, दोघांनाही अन्नाचा शाप लागतो.

गरिबीमुळे काहीजण भाकरी, ब्रेड, वडे, समोसे अथवा लाडू वगैरे चोरून खाण्याचा प्रयत्न करतात व शेवटी जमावाकडून मारही खातात. मांजरे व तत्सम प्राणी काही वेळा चोरून दूर पितात म्हणून काहीजण त्यांना मारतात. अथवा हुसकावून लावतात. चोरी करू नये हे बरोबर असले तरी त्या मुक्या प्राण्यांना काय समजणार ? एखाद्याचा तोंडचा घास काढून घेणे हे शापाला आमंत्रण देते. त्यासाठी असे प्रकार करू नका.

मतभेद वगैरे असतील तर नंतरही त्यावर बोलता येते, पण समोर अन्न असताना चुकूनही तोंडातून अपशब्द काढू नयेत. तसेच कुणाला कोणता सल्लाही देऊ नये. घर असो वा हॉटेल, लग्न, मुंजीचा कार्यक्रम अथवा कोणताही समारंभ असो, लोकांनी शांत मनाने जेवण केले तरच तो आशीर्वाद ठरतो व रागारागात कसे तरी चार घास पोटात ढकलल्यास तो अन्नपूर्णेचा अपमान होतो व वेळ येताच त्याचे अनिष्ट परिणाम जाणवू लागतात. यासाठी जेवण्यापूर्वी ताटाभोवती पाणी फिरवून चित्रावळी काढली जाते व काही शिते ज्ञात अज्ञात जीवासाठी काढून ठेवण्यासाठी प्रथा आहे. मंगलकार्याच्यावेळी ताटाभोवती रांगोळी काढली जाते. अन्नपूर्णा देवी प्रसन्न राहावी. संपूर्ण कुटुंबाचे रक्षण व्हावे, घर धनधान्याने भरलेले असावे, सर्वांची भरभराट व्हावी हा त्या मागील हेतू असतो.

अन्न शिजविणारी अथवा वाढणारी किंवा हॉटेलात सप्लाय करणारे हातात अन्न असताना असणारी कोणतीही व्यक्ती असो त्यांचे चांगले, वाईट विचार हातात धरलेल्या अन्नात उतरतात त्यासाठी मन शांत नसताना अथवा राग, रुसवे तसेच मन प्रक्षुब्ध असेल तर शक्यतो खाणे-पिणे करू नये.

मनुष्यप्राणी राबतो पोटासाठी पण ते अन्न जर तुम्ही शांतपणे खात नसाल तर त्या राबण्याचा उपयोग काय अन्नाच्या नासाडीने अन्नपूर्णेचा अपमान होत असेल तर त्याचे अनेक दोष निर्माण होतात व ते पुढे त्रासदायक ठरतात. हे दोष दूर व्हावेत यासाठी पंचमहायज्ञ रोज करावा असे ज्योतिषशास्त्रात सांगितलेले आहे. ‘अतिथी देवो भव’ ही म्हणही त्यासाठीचा वापरतात. कावळे, चिमण्या, कबुतरे, कुत्री, मांजरे, गायी व इतर मुक्या प्राण्यांना खाऊ घातल्यास आपल्या कमाईला ऊर्जितावस्था येते. ज्यावेळी संकेत येतात त्यावेळी कुणाच्या तरी रूपाने देव आपले रक्षण करीत असतो. अपघात होत नाहीत व झालाच तरी त्यातून सहीसलामत सुटका होते. अन्नदान केल्याने अनेक दोष नष्ट होतात, राहती वास्तूही शांत राहते. स्वतःची अध्यात्मिक शक्तीही वाढते.

मल्हारी हृदय स्तोत्र

🌹 *श्री मल्हारी हृदय स्तोत्र* 🌹

श्री गणेशाय नमः ॥
ॐ अस्य श्री मल्लारि-हृदय मंत्रस्य ।
ब्रह्मा विष्णू महेश्र्वरा ऋषयः ॥
अनुष्टुप् छंदः । श्री गंगा म्हालसायुक्त मल्लारि देवता ॥
भुर्भुवः स्वः इति बीजम् ॥ तत्सवितुर्वरेण्यं इति शक्तिः ॥
भर्गो देवस्य धीमहि इति कीलकं ॥ धियो यो नः प्रचोदयादित्यस्थम् ॥
श्री मार्तंड-भैरव प्रीत्यर्थं ॥ मम समस्त पुरुषार्थ सिद्धर्थे जपे विनियोगः ॥
अंगन्यासः ॐ ऐं मल्लारये नमः अंगुष्टाभ्यां नमः हृदयाय नमः ॥
ॐ र्‍हीं म्हालसानाथाय नमः तर्जनीभ्यां नमः शिरसे स्वाहा ॥
ॐ श्री मेघनाथाय नमः मध्यमाभ्यां नमः शिखायै वौषट् ॥
ॐ क्लीं महीपतये नमः अनामिकाभ्यां नमः कवचाय हूं ॥
ॐ सीं मैरालाय नमः कनिष्ठिकाभ्यां नमः नेत्र त्रयाय वौषट् ॥
ॐ ऐं र्‍हीं श्रीं क्लीं सौं खङगराजाय नमः करतल करपृष्ठाभ्यां नमः ॥
अस्त्राय फट् ॥ ॐ भूर्भुवः स्वरोम इति दिग्बंधः ॥
अथ ध्यानम्
ध्यायेन्मार्तडरुपं अचल-चल-विभूं कोटि सूर्य प्रकाशं ।
आनंदं विश्ववंद्यं सकल जनकरं कर्मधर्मादि नाथं ।
अश्वं बोधावरुढं परमविरलं श्री कोटि कंदर्प दर्पम् ।
श्रीमन्मल्लारि राजं विजय जयकरं म्हाळसाकांत सिद्धं ॥
अथ ऋषिन्यासः
ॐ र्‍हीं विष्णवे नमः तर्जनीभ्यां नमः शिरसे स्वाहा ॥
ॐ श्री महेशह्वराय नमः मध्यमाभ्यां नमः शिखायै वौषट् ।
ॐ क्लीं कामबीजाय नमः अनामिकाभ्यां नमः, कवचाय हूं ॥
ॐ सौं शक्तिबीजाय नमः कनिष्टिकाभ्यां नमः नेत्रत्रयाय वौषट् ॥
ॐ ऐं र्‍हीं श्रीं क्लीं सौं ब्रह्मा विष्णू महेश्वराभ्यां नमः
करतल करपृष्ठाभ्यां नमः अस्त्राय फट् ॥
पूर्वे श्वेतांबरं देवं आग्नेयां रुद्र भैरवं ।
दक्षिणे चंडरुपाय नैऋत्यां क्रोधभैरवं ॥
पश्चिमे उन्नतग्रीवं वायव्यां कालभैरवं ॥
उत्तरे सिद्धिं सिद्धांतं ईशान्यां शिवकर्पूरम् ॥
उर्ध्वे कालविरुपाय अंबरे मल्ल हारिणीं ॥
अंतरिक्षं सदानंदं यळकोटि स्वरुपिणं ॥
एवं एकादशं देवं रक्षे त्रैलोक्य सर्वदा ।
विजयी सर्व कामार्थ क्षेत्रपाल महीपते ।
भ्रुवोर्मध्येतु ॐकारं द्विदले सहस्र भावनः ।
नेत्रे त्रिपुरांतक देव नासिके कामहारक ॥
मुखे मुमुक्षनाथाय, कंठं कर्म कलामृत ॥
हृदयं हरिलिंगाय स्कंधे कर्म हरि प्रियं ॥
पृष्ठे प्रीलय रुद्राय उदरे उदयार्कजम् ॥
मध्ये रक्षतु कायार्थी नाभी नारद जायते ॥
गुह्यं गुरुपथान्माय जंघे जिव प्रदोक्तु ॥
जानुमंडल जानाथ पद प्रासाद प्राप्तये ॥
अंगुष्ठे सर्व तीर्थानि, सर्वांगे परमेश्र्वरः ॥
एवं अंगेषु दिव्यस्य मार्तंड स्वरुपिणं ॥
प्रथमं काशिनाथाय । द्वितीयं पंचलिंगयो ।
तृतीयं प्रेमलिंगाय । चतुर्थं देवरुपिणीम् ।
पंचमं पंचप्राणाय । षष्ठं षङ्भुज क्षेमकम् ।
सप्तकं सपाकं सिद्धी । अष्टमं अंबिकाप्रियम् ।
नवमं नागनाथं च । दशमं शोषहारकं ।
एकादशं महारुद्रं । द्वादशे ज्योतिः लिंगयोः ।
त्रयोदशं त्रियोगीच । चतुर्दशं भुवनत्रये ॥
पंचदशं मंडलं पूर्व । षोडशं च समाधिने ।
सप्तदशं गुह्यरुपं । अष्टदशं च अब्जकम् ।
नवदशं नैसर्गिक देवी । तन्नो देवी प्रसन्नता ॥
एकोनविंशति नामानि विश्वंभर स्वरुपयो ।
ज्ञानसिद्धी भवेत्प्राप्ती । एकादशं जपं जले ।
स्मशाने दशपाठं च सप्तवारं पठेन्नरः ।
सर्वपगो भवेत् हानिः संग्रामे विजयी भवेत् ।
अश्वत्थं बिल्वं मादारं चंदनं धातुपंचकं ।
शामा सुगंधि कादंबा नववारं पठेत्सुखं ।
मंत्रसिद्धी नवरात्रेण । अष्टरात्रं च देवतम् ।
पंचरात्रे जनवश्यं, त्रिरात्रं त्रिसमाहीतः ॥
द्विरात्रं व्याघ्र सर्पाणाम् मोहनं मंत्र मालिका ।
एवं हृदयं मार्तंड पाठं शुभकुलं जये ॥
मार्तंड क्षेत्र मान्यो वा कर्म धर्म सुखोवहं ॥
एवं विशांति ते कार्य । मार्तंड रुप दर्शिनम् ॥
भावार्थ तारको देव परब्रह्म स्वरुपिणीम् ॥
इति श्रुति-स्मृति योगार्णव श्री मार्तंड अवतार प्रोक्तं
ईश्र्वर-पार्वति संवादे मल्लारि हृदय संपूर्णम् ॥

*धर्मज्ञानगंगा समूह*

Thursday, 5 July 2018

कैलासीचा देव भोळा चक्रवर्ती

कैलासींचा देव भोळा चक्रवर्ती । पार्वतीचा पति योगिराज ॥१॥

तयाचिया पाया माझे दंडवत । घडो आणि प्रीत जडो नामीं ॥२॥

जटाजूट गंगा अर्धचंद्र भाळीं । तिजा नेत्रज्वाळी जात वेद ॥३॥

कंठीं काळकूट डौर त्रिशूल हातीं । सर्वांगीं विभूति शोभतसे ॥४॥

गळां रुंडमाळा खापर हस्तकीं । रामनाम मुखीं सर्व-काळ ॥५॥

व्याघ्रचर्मधारी स्मशानीं राहिला । संगें भूतमेळा बिरा-जित ॥६॥

नामा ह्मणे नामें नासोनियां पाप । करीं मुखरूप भक्तांलागीं ॥७॥