Wednesday, 15 August 2018

नौ ग्रह मंत्र दुर्भाग्य दूर करने के लिये

अगर किसी व्यक्ति की कुंडली में नौ ग्रहों से संबंधित कोई दोष है तो उन्हें देवी-देवताओं की कृपा भी नहीं मिल पाती है। इस कारण कार्यों में असफलता मिलती है, भाग्य साथ नहीं देता, घर-परिवार में अशांति रहती है। कुंडली के दोष और दुर्भाग्य को दूर करने के लिए ज्योतिष में कई उपाय बताए गए हैं। शास्त्रों में बताए गए अधिकतर उपाय या पूजा-पाठ नहाने के बाद ही करना चाहिए, लेकिन उज्जैन के ज्योतिषाचार्य पं. मनीष शर्मा के अनुसार कुछ ऐसे शुभ काम भी बताए गए हैं जो बिना नहाए किए जा सकते हैं। जानिए ऐसे ही कुछ खास शुभ काम...

पहला काम:

शास्त्रों के अनुसार व्यक्ति को ब्रह्म मुहूर्त यानी सूर्य से पहले ही बिस्तर छोड़ देना चाहिए। जो व्यक्ति सुबह देर तक सोता है, उसकी बुद्धि कम होती है और दुर्भाग्य बढ़ता है।

दुसरा काम :

स्त्री हो या पुरुष रोज सुबह जागते ही इस मंत्र का जाप अवश्य करें।

मंत्र
ब्रह्मा मुरारिस्त्रिपुरान्तकारी भानुः शशी भूमिसुतो बुधश्च।
गुरुश्च शुक्रः शनि राहुकेतवः कुर्वन्तु सर्वे ममसुप्रभातम्॥

इस मंत्र का जाप करने से सभी देवी-देवता और नौ ग्रहों की कृपा मिलती है। इस मंत्र का अर्थ यह है कि ब्रह्मा, विष्णु, शिव, सूर्य, चंद्र, मंगल, बुध, बृहस्पति, शुक्र, शनि, राहु और केतु ये सभी मेरे प्रातःकाल यानी सुबह को मंगलमय बनाएं। ये शुभ काम सुबह जागते ही करने से दुर्भाग्य से मुक्ति मिल सकती है।

तिसरा काम :

हमारे हाथों के अग्रभाग में देवी लक्ष्मी, मध्य में सरस्वती और हाथ के मूलभाग में भगवान विष्णु का वास है। इसलिए सुबह जागते ही अपनी दोनों हथेलियों को देखकर मंत्र का पाठ करना चाहिए-

कराग्रे वसते लक्ष्मीः करमध्ये सरस्वती।
करमूले तू गोविंद: प्रभाते करदर्शनम्॥

चौथा काम :

हिन्दू धर्म में भूमि यानि धरती को भी देवी का दर्जा दिया गया है। परंतु हमारी विवशता है कि हमें इसी भूमि देवी पर पांव रखना पड़ता है। सुबह उठते ही भूमि पर पांव रखने से पहले व्यक्ति को यहां बताए गए मंत्र का जाप करते हुए भूमि देवी से क्षमा याचना करनी चाहिए।

मंत्र : समुद्रवसने देवि पर्वतस्तनमण्डिते। विष्णुपत्नि नमस्तुभ्यं पादस्पर्शं क्षमस्व मे॥

Tuesday, 14 August 2018

States and union territories India

States and Capitals



Arunachal Pradesh (Itanagar)
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Assam (Dispur)
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Bihar (Patna)
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Chhattisgarh (Raipur)
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Goa (Panaji)
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Gujarat (Gandhinagar)
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Haryana (Chandigarh)
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Himachal Pradesh (Shimla)
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Jammu & Kashmir (Srinagar{S*}, Jammu{W*})
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Jharkhand (Ranchi)
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Karnataka (Bangalore)
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Kerala (Thiruvananthapuram)
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Madhya Pradesh (Bhopal)
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Maharashtra (Mumbai)
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Manipur (Imphal)
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Meghalaya (Shillong)
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Mizoram (Aizawl)
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Nagaland (Kohima)
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Odisha (Bhubaneshwar)
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Punjab (Chandigarh)
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Rajasthan (Jaipur)
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Sikkim (Gangtok)
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Tamil Nadu (Chennai)
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Telangana (Hyderabad)
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Tripura (Agartala)
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Uttarakhand (Dehradun)
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Uttar Pradesh (Lucknow)
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West Bengal (Kolkata)
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Union Territories and Capitals

Andaman and Nicobar Islands (Port Blair)
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Chandigarh (Chandigarh)
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The Government of NCT of Delhi (Delhi)
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Dadra and Nagar Haveli (Silvassa)
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Daman and Diu (Daman)
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Lakshadweep (Kavaratti)
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Puducherry (Puducherry)
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Note

Monday, 13 August 2018

शिव चालीसा

दोहा 

श्री गणेश गिरिजा सुवन, मंगल मूल सुजान । 
कहत अयोध्यादास तुम, देहु अभय वरदान ॥

जय गिरिजा पति दीन दयाला । 
सदा करत सन्तन प्रतिपाला ॥

भाल चन्द्रमा सोहत नीके । 
कानन कुण्डल नागफनी के॥

अंग गौर शिर गंग बहाये । 
मुण्डमाल तन छार लगाये ॥

वस्त्र खाल बाघम्बर सोहे । 
छवि को देख नाग मुनि मोहे ॥

मैना मातु की ह्वै दुलारी । 
बाम अंग सोहत छवि न्यारी ॥

कर त्रिशूल सोहत छवि भारी । 
करत सदा शत्रुन क्षयकारी ॥

नन्दि गणेश सोहै तहँ कैसे । 
सागर मध्य कमल हैं जैसे॥

कार्तिक श्याम और गणराऊ । 
या छवि को कहि जात न काऊ ॥

देवन जबहीं जाय पुकारा । 
तब ही दुख प्रभु आप निवारा ॥

किया उपद्रव तारक भारी । 
देवन सब मिलि तुमहिं जुहारी ॥

तुरत षडानन आप पठायउ । 
लवनिमेष महँ मारि गिरायउ ॥

आप जलंधर असुर संहारा। 
सुयश तुम्हार विदित संसारा ॥

त्रिपुरासुर सन युद्ध मचाई । 
सबहिं कृपा कर लीन बचाई ॥

किया तपहिं भागीरथ भारी । 
पुरब प्रतिज्ञा तासु पुरारी ॥

दानिन महं तुम सम कोउ नाहीं । 
सेवक स्तुति करत सदाहीं ॥

वेद नाम महिमा तव गाई । 
अकथ अनादि भेद नहिं पाई ॥

प्रगट उदधि मंथन में ज्वाला । 
जरे सुरासुर भये विहाला ॥

कीन्ह दया तहँ करी सहाई । 
नीलकण्ठ तब नाम कहाई ॥

पूजन रामचंद्र जब कीन्हा । 
जीत के लंक विभीषण दीन्हा ॥

सहस कमल में हो रहे धारी । 
कीन्ह परीक्षा तबहिं पुरारी ॥

एक कमल प्रभु राखेउ जोई । 
कमल नयन पूजन चहं सोई ॥

कठिन भक्ति देखी प्रभु शंकर । 
भये प्रसन्न दिए इच्छित वर ॥

जय जय जय अनंत अविनाशी । 
करत कृपा सब के घटवासी ॥

दुष्ट सकल नित मोहि सतावै । 
भ्रमत रहे मोहि चैन न आवै ॥

त्राहि त्राहि मैं नाथ पुकारो । 
यहि अवसर मोहि आन उबारो ॥

लै त्रिशूल शत्रुन को मारो । 
संकट से मोहि आन उबारो ॥

मातु पिता भ्राता सब कोई । 
संकट में पूछत नहिं कोई ॥

स्वामी एक है आस तुम्हारी । 
आय हरहु अब संकट भारी ॥

धन निर्धन को देत सदाहीं । 
जो कोई जांचे वो फल पाहीं ॥

अस्तुति केहि विधि करौं तुम्हारी । 
क्षमहु नाथ अब चूक हमारी ॥

शंकर हो संकट के नाशन । 
मंगल कारण विघ्न विनाशन ॥

योगी यति मुनि ध्यान लगावैं । 
नारद शारद शीश नवावैं ॥

नमो नमो जय नमो शिवाय । 
सुर ब्रह्मादिक पार न पाय ॥

जो यह पाठ करे मन लाई । 
ता पार होत है शम्भु सहाई ॥

ॠनिया जो कोई हो अधिकारी । 
पाठ करे सो पावन हारी ॥

पुत्र हीन कर इच्छा कोई । 
निश्चय शिव प्रसाद तेहि होई ॥

पण्डित त्रयोदशी को लावे । 
ध्यान पूर्वक होम करावे ॥

त्रयोदशी ब्रत करे हमेशा । 
तन नहीं ताके रहे कलेशा ॥

धूप दीप नैवेद्य चढ़ावे । 
शंकर सम्मुख पाठ सुनावे ॥

जन्म जन्म के पाप नसावे । 
अन्तवास शिवपुर में पावे ॥

कहे अयोध्या आस तुम्हारी । 
जानि सकल दुःख हरहु हमारी॥

॥ दोहा ॥

नित्त नेम कर प्रातः ही, पाठ करौं चालीसा। तुम मेरी मनोकामना, पूर्ण करो जगदीश ॥

मगसर छठि हेमन्त ॠतु, संवत चौसठ जान । अस्तुति चालीसा शिवहि, पूर्ण कीन कल्याण ॥

॥इति शिव चालीसा ॥

शिवजी की आरती

कर्पूरगौरं करुणावतारं संसारसारं भुजगेन्द्रहारं |
सदा वसन्तं ह्रदयाविन्दे भंव भवानी सहितं नमामि ॥

जय शिव ओंकारा हर ॐ शिव ओंकारा |
ब्रम्हा विष्णु सदाशिव अद्धांगी धारा ॥

ॐ जय शिव ओंकारा......
एकानन चतुरानन पंचांनन राजे |
हंसासंन ,गरुड़ासन ,वृषवाहन साजे॥

ॐ जय शिव ओंकारा......
दो भुज चारु चतुर्भज दस भुज अति सोहें |
तीनों रुप निरखता त्रिभुवन जन मोहें॥

ॐ जय शिव ओंकारा......
अक्षमाला ,बनमाला ,रुण्ड़मालाधारी |
चंदन , मृदमग सोहें, भाले शशिधारी ॥

ॐ जय शिव ओंकारा......
श्वेताम्बर,पीताम्बर, बाघाम्बर अंगें सनकादिक, ब्रम्हादिक ,भूतादिक संगें ॐ जय शिव ओंकारा......
कर के मध्य कमड़ंल चक्र ,त्रिशूल धरता |
जगकर्ता, जगभर्ता, जगसंहारकर्ता ॥

ॐ जय शिव ओंकारा......
ब्रम्हा विष्णु सदाशिव जानत अविवेका |
प्रवणाक्षर मध्यें ये तीनों एका ॥

ॐ जय शिव ओंकारा......
काशी में विश्वनाथ विराजत नन्दी ब्रम्हचारी |
नित उठी भोग लगावत महिमा अति भारी ॥

ॐ जय शिव ओंकारा......
त्रिगुण शिवजी की आरती जो कोई नर गावें |
कहत शिवानंद स्वामी मनवांछित फल पावें ॥

ॐ जय शिव ओंकारा..... जय शिव ओंकारा हर ॐ शिव ओंकारा|
ब्रम्हा विष्णु सदाशिव अद्धांगी धारा॥

ॐ जय शिव ओंकारा......

Saturday, 11 August 2018

श्री साईमहिमाष्टक

सदासत्स्वरूपं चिदानन्दकन्दं
जगत्सम्भवस्धान संहार हेतुं
स्वभक्तेच्छया मानुषं दर्शयन्तं
नमामीश्वरं सद्गुरुं सायिनाथं ll

भवध्वान्त विध्वंस मार्ताण्डमीड्यं
मनोवागतीतं मुनिर् ध्यान गम्यं
जगद्व्यापकं निर्मलं निर्गुणं त्वां
नमामीश्वरं सद्गुरुं सायिनाथं ll

भवाम्भोदि मग्नार्धितानां जनानां
स्वपादाश्रितानां स्वभक्ति प्रियाणां
समुद्दारणार्धं कलौ सम्भवन्तं
नमामीश्वरं सद्गुरुं सायिनाथं  ll

सदानिम्ब वृक्षस्यमुलाधि वासात्
सुधास्राविणं तिक्त मप्य प्रियन्तं
तरुं कल्प वृक्षाधिकं साधयन्तं
नमामीश्वरं सद्गुरुं सायिनाथं ll

सदाकल्प वृक्षस्य तस्याधिमूले
भवद्भावबुद्ध्या सपर्यादिसेवां
नृणां कुर्वतां भुक्तिमुक्ति प्रदन्तं
नमामीश्वरं सद्गुरुं सायिनाथं ll


अनेका शृता तर्क्य लीला विलासै:
समा विष्कृतेशान भास्वत्र्पभावं
अहम्भावहीनं प्रसन्नात्मभावं
नमामीश्वरं सद्गुरुं सायिनाथं ll

सतां विश्रमाराम मेवाभिरामं
सदासज्जनै संस्तुतं सन्नमद्भि:
जनामोददं भक्त भद्र प्रदन्तं
नमामीश्वरं सद्गुरुं सायिनाथं ll

अजन्माद्यमेकं परम्ब्रह्म साक्षात्
स्वयं सम्भवं राममेवावतीर्णं
भवद्दर्शनात्सम्पुनीतप्रभोहं
नमामीश्वरं सद्गुरुं सायिनाथं 

श्रीसायिश कृपानिधे खिलनृणां सर्वार्धसिद्दिप्रद
युष्मत्पादरज: प्रभावमतुलं धातापिवक्ताक्षम:
सद्भक्त्याश्शरणं कृताञ्जलिपुट: सम्प्राप्तितोस्मिन् प्रभो
श्रीमत्सायिपरेश पाद कमलान् नान्यच्चरण्यंमम 
सायिरूपधर राघवोत्तमं
भक्तकाम विबुध द्रुमं प्रभुं
माययोपहत चित्त शुद्धये
चिन्तयाम्यह महर्निशं मुदा
शरत्सुधांशं प्रतिमं प्रकाशं
कृपातपत्रं तवसायिनाथ
त्वदीयपादाब्ज समाश्रितानां
स्वच्छाययाताप मपाकरोतु
उपासनादैवत सायिनाथ
स्मवैर्म योपासनि नास्तुतस्त्वं
रमेन्मनोमे तवपादयुग्मे
भ्रुङ्गो यदाब्जे मकरन्दलुब्ध:
अनेकजन्मार्जित पापसङ्क्षयो
भवेद्भवत्पाद सरोज दर्शनात्
क्षमस्व सर्वानपराध पुञ्जकान्
प्रसीद सायिश सद्गुरो दयानिधे
श्रीसायिनाथ चरणामृत पूर्णचित्ता
तत्पाद सेवनरता स्सत तञ्च भक्त्या
संसारजन्य दुरितौघ विनिर्ग तास्ते
कैवल्य धाम परमं समवाप्नुवन्ति ll
स्तोत्रमे तत्पठेद्भक्त्या योन्नरस्तन्मनासदा
सद्गुरोसायिनाथस्य कृपापात्रं भवेद्भवं ll

श्री साई चालीसा

पहले साईं के चरणों में, अपना शीश नमाऊं मैं ।
कैसे शिर्डी साईं आए, सारा हाल सुनाऊं मैं ॥1॥

कौन हैं माता, पिता कौन हैं, यह न किसी ने भी जाना ।
कहां जनम साईं ने धारा, प्रश्न पहेली रहा बना ॥
कोई कहे अयोध्या के ये, रामचन्द्र भगवान हैं ।
कोई कहता साईंबाबा, पवन-पुत्र हनुमान हैं ॥
कोई कहता मंगल मूर्ति, श्री गजानन हैं साईं ।
कोई कहता गोकुल-मोहन, देवकी नन्दन हैं साईं ॥
शंकर समझ भक्त कई तो, बाबा को भजते रहते ।
कोई कह अवतार दत्त का, पूजा साईं की करते ॥
कुछ भी मानो उनको तुम, पर साईं हैं सच्चे भगवान ।
बड़े दयालु, दीनबन्धु, कितनों को दिया है जीवन दान ॥
कई वर्ष पहले की घटना, तुम्हें सुनाऊंगा मैं बात ।
किसी भाग्यशाली की, शिर्डी में आई थी बारात ॥
आया साथ उसी के था, बालक एक बहुत सुन्दर ।
आया, आकर वहीं बस गया, पावन शिर्डी किया नगर ॥
कई दिनों तक रहा भटकता, भिक्षा मांगी उसने दर-दर ।
और दिखाई ऐसी लीला, जग में जो हो गई अमर ॥
जैसे-जैसे उमर बढ़ी, वैसे ही बढ़ती गई शान ।
घर-घर होने लगा नगर में, साईं बाबा का गुणगान ॥
दिग्-दिगन्त में लगा गूंजने, फिर तो साईंजी का नाम ।
दीन-दुखी की रक्षा करना, यही रहा बाबा का काम ॥
बाबा के चरणों में जाकर, जो कहता मैं हूं निर्धन ।
दया उसी पर होती उनकी, खुल जाते दु:ख के बन्धन ॥
कभी किसी ने मांगी भिक्षा, दो बाबा मुझको सन्तान ।

एवं अस्तु तब कहकर साईं, देते थे उसको वरदान ॥
स्वयं दु:खी बाबा हो जाते, दीन-दुखी जन का लख हाल ।
अन्त: करण श्री साईं का, सागर जैसा रहा विशाल ॥
भक्त एक मद्रासी आया, घर का बहुत बड़ा धनवान ।
माल खजाना बेहद उसका, केवल नहीं रही सन्तान ॥
लगा मनाने साईं नाथ को, बाबा मुझ पर दया करो ।
झंझा से झंकृत नैया को, तुम ही मेरी पार करो ॥
कुलदीपक के अभाव में, व्यर्थ है दौलत की माया ।
आज भिखारी बन कर बाबा, शरण तुम्हारी मैं आया ॥
दे दो मुझको पुत्र दान, मैं ॠणी रहूंगा जीवन भर ।
और किसी की आस न मुझको, सिर्फ़ भरोसा है तुम पर ॥
अनुनय-विनय बहुत की उसने, चरणों में धर के शीश ।
तब प्रसन्न होकर बाबा ने, दिया भक्त को यह आशीष ॥
`अल्लाह भला करेगा तेरा`, पुत्र जन्म हो तेरे घर ।
कृपा होगी तुम पर उसकी, और तेरे उस बालक पर ॥
अब तक नही किसी ने पाया, साईं की कृपा का पार ।
पुत्र रत्न दे मद्रासी को, धन्य किया उसका संसार ॥
तन-मन से जो भजे उसी का, जग में होता है उद्धार ।
सांच को आंच नहीं है कोई, सदा झूठ की होती हार ॥
मैं हूं सदा सहारे उसके, सदा रहूंगा उसका दास ।
साईं जैसा प्रभु मिला है, इतनी ही कम है क्या आस ॥
मेरा भी दिन था इक ऐसा, मिलती नहीं मुझे थी रोटी ।
तन पर कपड़ा दूर रहा था, शेष रही नन्हीं सी लंगोटी ॥
सरिता सन्मुख होने पर भी मैं प्यासा का प्यासा था ।
दुर्दिन मेरा मेरे ऊपर, दावाग्नि बरसाता था ॥
धरती के अतिरिक्त जगत में, मेरा कुछ अवलम्ब न था ।
बना भिखारी मैं दुनिया में, दर-दर ठोकर खाता था ॥
ऐसे में इक मित्र मिला जो, परम भक्त साईं का था ।
जंजालों से मुक्त मगर इस, जगती में वह मुझ-सा था ॥
बाबा के दर्शन की खातिर, मिल दोनों ने किया विचार ।
साईं जैसे दया-मूर्ति के, दर्शन को हो गए तैयार ॥
पावन शिर्डी नगरी में जाकर, देखी मतवाली मूर्ति ।
धन्य जन्म हो गया कि हमने, जब देखी साईं की सूरति ॥
जबसे किए हैं दर्शन हमने, दु:ख सारा काफूर हो गया ।
संकट सारे मिटे और, विपदाओं का अन्त हो गया ॥
मान और सम्मान मिला, भिक्षा में हमको बाबा से ।
प्रतिबिम्बित हो उठे जगत में, हम साईं की आभा से ॥
बाबा ने सम्मान दिया है, मान दिया इस जीवन में ।
इसका ही सम्बल ले मैं, हंसता जाऊंगा जीवन में ॥
साईं की लीला का मेरे, मन पर ऐसा असर हुआ ।
लगता जगती के कण-कण में, जैसे हो वह भरा हुआ ॥
"काशीराम" बाबा का भक्त, इस शिर्डी में रहता था ।
मैं साईं का साईं मेरा, वह दुनिया से कहता था ॥
सीकर स्वयं वस्त्र बेचता, ग्राम नगर बाजारों में ।
झंकृत उसकी हृद तन्त्री थी, साईं की झंकारों में ॥
स्तब्ध निशा थी, थे सोये, रजनी आंचल में चांद-सितारे ।
नहीं सूझता रहा हाथ को हाथ तिमिर के मारे ॥
वस्त्र बेचकर लौट रहा था, हाय! हाट से "काशी" ।
विचित्र बड़ा संयोग कि उस दिन, आता था वह एकाकी ॥
घेर राह में खड़े हो गए, उसे कुटिल, अन्यायी ।
मारो काटो लूटो इस की ही ध्वनि पड़ी सुनाई ॥
लूट पीट कर उसे वहां से, कुटिल गये चम्पत हो ।
आघातों से ,मर्माहत हो, उसने दी संज्ञा खो ॥
बहुत देर तक पड़ा रहा वह, वहीं उसी हालत में ।
जाने कब कुछ होश हो उठा, उसको किसी पलक में ॥
अनजाने ही उसके मुंह से, निकल पड़ा था साईं ।
जिसकी प्रतिध्वनि शिर्डी में, बाबा को पड़ी सुनाई ॥
क्षुब्ध उठा हो मानस उनका, बाबा गए विकल हो ।
लगता जैसे घटना सारी, घटी उन्हीं के सम्मुख हो ॥
उन्मादी से इधर-उधर, तब बाबा लगे भटकने ।
सम्मुख चीजें जो भी आईं, उनको लगे पटकने ॥
और धधकते अंगारों में, बाबा ने अपना कर डाला ।
हुए सशंकित सभी वहां, लख ताण्डव नृत्य निराला ॥
समझ गए सब लोग कि कोई, भक्त पड़ा संकट में ।
क्षुभित खड़े थे सभी वहां पर, पड़े हुए विस्मय में ॥
उसे बचाने के ही खातिर, बाबा आज विकल हैं ।
उसकी ही पीड़ा से पीड़ित, उनका अन्त:स्थल है ॥
इतने में ही विधि ने अपनी, विचित्रता दिखलाई ।
लख कर जिसको जनता की, श्रद्धा-सरिता लहराई ॥
लेकर कर संज्ञाहीन भक्त को, गाड़ी एक वहां आई ।
सम्मुख अपने देख भक्त को, साईं की आंखें भर आईं ॥
शान्त, धीर, गम्भीर सिन्धु-सा, बाबा का अन्त:स्थल ।
आज न जाने क्यों रह-रह कर, हो जाता था चंचल ॥
आज दया की मूर्ति स्वयं था, बना हुआ उपचारी ।
और भक्त के लिए आज था, देव बना प्रतिहारी ॥51॥
आज भक्ति की विषम परीक्षा में, सफल हुआ था “काशी” ।
उसके ही दर्शन के खातिर, थे उमड़े नगर-निवासी ॥
जब भी और जहां भी कोई, भक्त पड़े संकट में ।
उसकी रक्षा करने बाबा, आते हैं पलभर में ॥
युग-युग का है सत्य यह, नहीं कोई नई कहानी ।
आपातग्रस्त भक्त जब होता, आते खुद अन्तर्यामी ॥
भेद-भाव से परे पुजारी, मानवता के थे साईं ।
जितने प्यारे हिन्दु-मुस्लिम, उतने ही थे सिक्ख ईसाई ॥
भेद-भाव मन्दिर-मस्जिद का, तोड़-फोड़ बाबा ने डाला ।
राम-रहीम सभी उनके थे, कृष्ण-करीम-अल्लाहताला ॥
घण्टे की प्रतिध्वनि से गूंजा, मस्जिद का कोना-कोना ।
मिले परस्पर हिन्दू-मुस्लिम, प्यार बढ़ा दिन-दिन दूना ॥
चमत्कार था कितना सुंदर, परिचय इस काया ने दी ।
और नीम कडुवाहट में भी, मिठास बाबा ने भर दी ॥
सबको स्नेह दिया साईं ने, सबको सन्तुल प्यार किया ।
जो कुछ जिसने भी चाहा, बाबा ने उनको वही दिया ॥
ऐसे स्नेह शील भाजन का, नाम सदा जो जपा करे ।
पर्वत जैसा दु:ख न क्यों हो, पलभर में वह दूर टरे ॥
साईं जैसा दाता हमने, अरे नहीं देखा कोई ।
जिसके केवल दर्शन से ही, सारी विपदा दूर हो गई ॥
तन में साईं, मन में साईं, साईं-साईं भजा करो ।
अपने तन की सुधि-बुधि खोकर, सुधि उसकी तुम किया करो ॥
जब तू अपनी सुधि तज, बाबा की सुधि किया करेगा ।
और रात-दिन बाबा, बाबा ही तू रटा करेगा ॥
तो बाबा को अरे! विवश हो, सुधि तेरी लेनी ही होगी ।
तेरी हर इच्छा बाबा को, पूरी ही करनी होगी ॥
जंगल-जंगल भटक न पागल, और ढूंढ़ने बाबा को ।
एक जगह केवल शिर्डी में, तू पायेगा बाबा को ॥
धन्य जगत में प्राणी है वह, जिसने बाबा को पाया ।
दु:ख में सुख में प्रहर आठ हो, साईं का ही गुण गाया ॥
गिरें संकटों के पर्वत, चाहे बिजली ही टूट पड़े ।
साईं का ले नाम सदा तुम, सम्मुख सब के रहो अड़े ॥
इस बूढ़े की करामात सुन, तुम हो जाओगे हैरान ।
दंग रह गये सुनकर जिसको, जाने कितने चतुर सुजान ॥
एक बार शिर्डी में साधू, ढ़ोंगी था कोई आया ।
भोली-भाली नगर-निवासी, जनता को था भरमाया ॥
जड़ी-बूटियां उन्हें दिखाकर, करने लगा वहां भाषण ।
कहने लगा सुनो श्रोतागण, घर मेरा है वृन्दावन ॥
औषधि मेरे पास एक है, और अजब इसमें शक्ति ।
इसके सेवन करने से ही, हो जाती दु:ख से मुक्ति ॥
अगर मुक्त होना चाहो तुम, संकट से बीमारी से ।
तो है मेरा नम्र निवेदन, हर नर से हर नारी से ॥
लो खरीद तुम इसको इसकी, सेवन विधियां हैं न्यारी ।
यद्यपि तुच्छ वस्तु है यह, गुण उसके हैं अति भारी ॥
जो है संतति हीन यहां यदि, मेरी औषधि को खायें ।
पुत्र-रत्न हो प्राप्त, अरे वह मुंह मांगा फल पायें ॥
औषधि मेरी जो न खरीदे, जीवन भर पछतायेगा ।
मुझ जैसा प्राणी शायद ही, अरे यहां आ पायेगा ॥
दुनियां दो दिन का मेला है, मौज शौक तुम भी कर लो ।
गर इससे मिलता है, सब कुछ, तुम भी इसको ले लो ॥
हैरानी बढ़ती जनता की, लख इसकी कारस्तानी ।
प्रमुदित वह भी मन ही मन था, लख लोगो की नादानी ॥
खबर सुनाने बाबा को यह, गया दौड़कर सेवक एक ।
सुनकर भृकुटि तनी और, विस्मरण हो गया सभी विवेक ॥
हुक्म दिया सेवक को, सत्वर पकड़ दुष्ट को लाओ ।
या शिर्डी की सीमा से, कपटी को दूर भगाओ ॥
मेरे रहते भोली-भाली, शिर्डी की जनता को ।
कौन नीच ऐसा जो, साहस करता है छलने को ॥
पल भर में ही ऐसे ढ़ोंगी, कपटी नीच लुटेरे को ।
महानाश के महागर्त में, पहुंचा दूं जीवन भर को ॥
तनिक मिला आभास मदारी क्रूर कुटिल अन्यायी को ।
काल नाचता है अब सिर पर, गुस्सा आया साईं को ॥
पल भर में सब खेल बन्द कर, भागा सिर पर रखकर पैर ।
सोच था मन ही मन, भगवान नहीं है अब खैर ॥
सच है साईं जैसा दानी, मिल न सकेगा जग में ।
अंश ईश का साईंबाबा, उन्हें न कुछ भी मुश्किल जग में ॥
स्नेह, शील, सौजन्य आदि का, आभूषण धारण कर ।
बढ़ता इस दुनिया में जो भी, मानव-सेवा के पथ पर ॥
वही जीत लेता है जगती के, जन-जन का अन्त:स्थल ।
उसकी एक उदासी ही जग को कर देती है विह्वल ॥
जब-जब जग में भार पाप का, बढ़ बढ़ ही जाता है ।
उसे मिटाने के ही खातिर, अवतारी ही आता है ॥
पाप और अन्याय सभी कुछ, इस जगती का हर के ।
दूर भगा देता दुनिया के, दानव को क्षण भर में ॥
स्नेह सुधा की धार बरसने, लगती है इस दुनिया में ।
गले परस्पर मिलने लगते, हैं जन-जन आपस में ॥
ऐसे ही अवतारी साईं, मृत्युलोक में आकर ।
समता का यह पाठ पढ़ाया, सबको अपना आप मिटाकर ॥
नाम द्वारका मस्जिद का, रक्खा शिर्डी में साईं ने ।
दाप, ताप, सन्ताप मिटाया, जो कुछ आया साईं ने ॥
सदा याद में मस्त राम की, बैठे रहते थे साईं ।
पहर आठ ही राम नाम का, भजते रहते थे साईं ॥
सूखी-रूखी, ताजी-बासी, चाहे या होवे पकवान ।
सदा प्यार के भूखे साईं की, खातिर थे सभी समान ॥
स्नेह और श्रद्धा से अपनी, जन जो कुछ दे जाते थे ।
बड़े चाव से उस भोजन को, बाबा पावन करते थे ॥
कभी-कभी मन बहलाने को, बाबा बाग में जाते थे ।
प्रमुदित मन निरख प्रकृति, छटा को वे होते थे ॥
रंग-बिरंगे पुष्प बाग के, मन्द-मन्द हिल-डुल करके ।
बीहड़ वीराने मन में भी, स्नेह सलिल भर जाते थे ॥
ऐसी सुमधुर बेला में भी, दु:ख आपात विपदा के मारे ।
अपने मन की व्यथा सुनाने, जन रहते बाबा को घेरे ॥
सुनकर जिनकी करूण कथा को, नयन कमल भर आते थे ।
दे विभूति हर व्यथा,शान्ति, उनके उर में भर देते थे ॥
जाने क्या अद्भुत,शक्ति, उस विभूति में होती थी ।
जो धारण करते मस्तक पर, दु:ख सारा हर लेती थी ॥
धन्य मनुज वे साक्षात् दर्शन, जो बाबा साईं के पाये ।
धन्य कमल-कर उनके जिनसे, चरण-कमल वे परसाये ॥
काश निर्भय तुमको भी, साक्षात साईं मिल जाता ।
बरसों से उजड़ा चमन अपना, फिर से आज खिल जाता ॥
गर पकड़ता मैं चरण श्री के, नहीं छोड़ता उम्रभर ।
मना लेता मैं जरूर उनको, गर रूठते साईं मुझ पर ॥
 

श्रीकृष्ण गोविंद हरे मुरारी

श्री कृष्णा गोविन्द हरे मुरारी
हे नाथ नारायण वासुदेवा

एक मात स्वामी सखा हमारे
हे नाथ नारायण वासुदेवा
बंदी गृह के तुम अवतारी
कही जन्मे कही पीला मुरारी

किसी के जाए किसी के कहे
है अद्भुत हर बात टिहरी
गोकुल में चमके मथुरा के तारे
हे नाथ नारायण वासुदेवा

श्री कृष्णा गोविन्द हरे मुरारी
हे नाथ नारायण वासुदेवा

आधार में बंशी ह्रदय में राधे
बात गए दोनों में आधे आधे
हे राधा नगर हे भक्त वत्सल
सदैव भक्तो के काम साढ़े
वहीँ गए वहीँ गए जहा गए पुकारे
हे नाथ नारायण वासुदेवा

राधे कृष्णा राधे कृष्णा
राधे राधे कृष्णा कृष्णा
#मेरेराम